ग़ज़ल
तेरी यादों का साया गहराता रहा,
ख़ामोशी में भी दिल बहलाता रहा।
चले थे अकेले पर कारवां बना,
हर मुसाफिर अपना बनाता रहा।
चांदनी रात में ख़्वाब सजते रहे,
दिल को तेरी खुशबू लुभाता रहा।
जख़्म दिल के वक़्त ने सिल दिए,
पर दर्द ग़ज़लों में समाता रहा।
इश्क़ का ये सफ़र भी अजीब था,
मंज़िलें पास आईं, पर दूर जाता रहा।
_ Furkan S Khan
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