मदरसों के निरीक्षण के नाम पर मुस्लिम छात्राओं की निजता का उल्लंघन, सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल

मदरसों के निरीक्षण के नाम पर मुस्लिम छात्राओं की निजता का उल्लंघन, सोशल मीडिया पर उठ रहे सवाल

बहराइच, 2 फरवरी – सरकारी निरीक्षण के नाम पर मुस्लिम नाबालिग और युवा छात्र-छात्राओं की निजता को सार्वजनिक किया जा रहा है। संजय मिश्रा, जो शिक्षा विभाग में एक अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं, ने हाल ही में विभिन्न मदरसों का निरीक्षण किया, लेकिन निरीक्षण की आड़ में जो कुछ हुआ, उस पर अब सवाल उठ रहे हैं।

मदरसों के निरीक्षण के नाम पर मुस्लिम छात्राओं की निजता का उल्लंघन

फेसबुक पर सार्वजनिक किए गए छात्राओं के वीडियो

मदरसों के निरीक्षण के दौरान संजय मिश्रा ने छात्र-छात्राओं की वीडियो रिकॉर्डिंग की और बिना किसी गोपनीयता उपाय (जैसे चेहरे ब्लर करना) अपनाए, उन्हें सीधे अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर सार्वजनिक रूप से पोस्ट कर दिया। इनमें से कई वीडियो में स्पष्ट रूप से दिखता है कि छात्राएं कैमरे के सामने असहज महसूस कर रही हैं, कुछ तो वीडियो रिकॉर्डिंग से बचने की भी कोशिश कर रही हैं, लेकिन फिर भी उनकी निजता का ध्यान नहीं रखा गया।

सिर्फ मदरसों के वीडियो क्यों? प्रोफाइल जांच में हुआ खुलासा

गहन जांच में यह सामने आया है कि संजय मिश्रा की फेसबुक प्रोफाइल पर केवल मदरसों के निरीक्षण से संबंधित वीडियो ही मौजूद हैं। यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि क्या यह निरीक्षण निष्पक्ष रूप से किया जा रहा है या फिर किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है? अगर शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और सुधार के लिए निरीक्षण जरूरी है, तो क्या यह नियम अन्य स्कूलों और संस्थानों पर भी समान रूप से लागू हो रहे हैं?

कानूनी और नैतिक पहलू

यह कृत्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (निजता का अधिकार) का उल्लंघन है, जो हर नागरिक को अपनी निजता की सुरक्षा का अधिकार देता है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66E के तहत, किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी तस्वीर या वीडियो लेना और उसे सार्वजनिक करना गैरकानूनी है। यदि इसमें नाबालिग छात्राएं शामिल हैं, तो यह POCSO Act, 2012 के तहत भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

सोशल मीडिया में आक्रोश, संजय मिश्रा से वीडियो हटाने की मांग
इस विषय पर कई यूजर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर संजय मिश्रा से उनके द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो और तस्वीरों को तुरंत हटाने की मांग की है। यह मांग केवल निजता की सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष और संवेदनशील प्रशासनिक रवैये की आवश्यकता को भी दर्शाती है।

प्रशासन की चुप्पी, आगे क्या?

अब सवाल यह उठता है कि क्या संबंधित प्रशासन इस मामले पर कोई कार्रवाई करेगा? क्या अन्य सरकारी अधिकारियों को भी ऐसे कृत्यों से बचने की हिदायत दी जाएगी? इस विषय पर अभी तक संजय मिश्रा या उनके विभाग से कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है।

यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण नैतिक और कानूनी मुद्दा है, जो बताता है कि कैसे डिजिटल युग में प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और गोपनीयता का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।




Furkan S Khan

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